Топ-100

अभीर ( अहीर) राजा पुरुरवा : दिनकर के काव्य 'उर्वशी' के नायक पुरुरवा का प्रेयसी को प्रेम प्रस्ताव

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ऋग्वेद में वैदिक संस्कृति की पहली कथा उर्वशी और राजा पुरुरवा की है।दो भिन्न संस्कृतियों की टकहराट की प्रतीक बन गयी है यह मार्मिक प्रणय-गाथा।उर्वशी के लिए रामधारी सिंह 'दिनकर' को ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित किया गया था।
उर्वशी स्वर्गलोक की मुख्य अप्सरा थी।वह देवराज इन्द्र के दरबार में हर शाम नृत्य किया करती थी। वह सुन्दर थी, उसने अपना हृदय किसी को अर्पित नहीं किया था। उर्वशी सभी देवताओं की महिला मित्र के रूप में ही जानी-मानी जाती थी।
एक बार वह और उसकी सखी चित्रलेखा और अन्य अप्सराएं, दोनों भू-लोक पर घूमने निकलीं। वहाँ एक असुर की उन पर दृष्टि जा पड़ी और उसने उनका अपहरण कर लिया।
वह उन्हें एक रथ में लिये चला जा रहा था और वे जोर-जोर से विलाप कर रही थीं कि भूलोक के एक राजा 'पुरुरवा' ने उनका चीत्कार सुन लिया। पुरुरवा सिंह के समान निर्भीक अभीर / अहीर ) राजा था बिना किसी हिचकिचाहट के असुर पर आक्रमण कर दिया। अन्ततः उसने असुर को अपनी तलवार से मौत घाट उतार दिया।
पुरुरवा और उर्वशी के बीच पनप रहे प्रेम के बीच निम्नलिखित पंक्तियां पुरुरवा के द्वारा कही गयीं हैं-
मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ,
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूँ

पर, न जानें, बात क्या है !
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता ,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूप सी नारी उसे मुस्कान से
मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग
वक्ष पर धर शीश मरना चाहता हूँ
मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ
प्राण के सर में उतरना चाहता हूँ

कौन कहता है,
तुम्हें मैं छोड़कर आकाश में विचरण करूंगा ?
बाहुओं के इस वलय में गात्र की बंदी नहीं है,
वक्ष के इस तल्प पर सोती न केवल देह ,
मेरे व्यग्र, व्याकुल प्राण भी विश्राम पाते हैं
मर्त्य नर को देवता कहना मृषा है,
देवता शीतल, मनुज अंगार है
देवताओं की नदी में ताप की लहरें न उठतीं,
किन्तु, नर के रक्त में ज्वालामुखी हुंकारता है,
घूर्नियाँ चिंगारियों की नाचती हैं,
नाचते उड़कर दहन के खंड पत्तों-से हवा में,
मानवों का मन गले-पिघले अनल की धार है

चाहिए देवत्व,
पर, इस आग को धर दूँ कहाँ पर?
कामनाओं को विसर्जित व्योम में कर दूँ कहाँ पर?
वह्नि का बेचैन यह रसकोष, बोलो कौन लेगा ?
आग के बदले मुझे संतोष ,बोलो कौन देगा?
फिर दिशाए मौन, फिर उत्तर नहीं है
प्राण की चिर-संगिनी यह वह्नि,
इसको साथ लेकर
भूमि से आकाश तक चलते रहो.
मर्त्य नर का भाग्य !
जब तक प्रेम की धारा न मिलती,
आप अपनी आग में जलते रहो
एक ही आशा, मरुस्थल की तपन में
ओ सजल कादम्बिनी! सर पर तुम्हारी छांह है.
एक ही सुख है, उरस्थल से लगा हूँ,
ग्रीव के नीचे तुम्हारी बांह है
इन प्रफुल्लित प्राण-पुष्पों में मुझे शाश्वत शरण दो,
गंध के इस लोक से बहार न जाना चाहता हूँ
मैं तुम्हारे रक्त के कान में समाकर
प्रार्थना के गीत गाना चाहता हूँ
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के महाकाव्य "उर्वशी" का एक अंश है।

अत्रि गोत्र्र