Топ-100

एक अदबी एक्टर इरफान की याद ... - प्रत्यक्ष मिश्रा

इरफान को गुजरे एक साल हो गया। इरफान का जाना केवल एक एक्टर की क्षति नही है। बल्कि अदब, तहज़ीब, इल्म और एक खास तरह की फकीरी ये सब इरफान के साथ-साथ दफन हो गई। इरफान से ज्यादा प्रतिभाशाली एक्टर बॉलिवुड ने दिए हैं। लेकिन अदब के मामले में बॉलिवुड, हॉलिवुड, टाॅलीवुड, भी पानी मांगते हैं। इरफान के अन्दर खास तरह का इल्म है। ऐसा इल्म जो इरफान को एक बन्धन तो देता, लेकिन बांधता नही है। इरफान गजब का नही अदब का एक्टर है। गजब का एक्टर होने के लिए डायरेक्टर्स का कन्ट्रोल रूल लागू होता है, लेकिन इरफान का इल्म इसकी इजाजत नही देता है।

इरफान ने हॉलीवुड में अपने एक्सपीरियंस को लेकर एक किस्सा शेयर किया था। इस किस्से में वह बताते हैं कि एक हॉलीवुड फिल्म की शूटिंग के दौरान डायरेक्टर ने उनसे डिमांड की थी, कि उन्हें इस सीन में अपना कुर्ता उतार कर बेड पर जाना होगा। ऐसे में इरफान खान ने अपने कपड़े उतारने से मना कर दिया। आपकी अदालत शो में एक्टर इरफान खान ने बताया था- ‘एक डायरेक्टर थे हॉलीवुड में, उन्होंने कहा आपका ये इंटीमेट सीन है और आप ये कुर्ता उतार दो। मैं बोला अरे मैं कुर्ता तो नहीं उतारूंगा। वो डायरेक्टर बोले- अरे तुम बेड पर हो, सो रहे हो, तुम कपड़े उतारके नहीं सोओगे? मैंने कहा अरे हमारे यहां नहीं सोते कपड़े उतारके। हमारे यहां तो कपड़े पहने-पहने सो जाते हैं।’
इरफान ने आगे कहा- ‘वहां का कैसा चलन है आप चाहे सोते हों, किसी के साथ या अकेले, कपड़े उतार दो औऱ फिर सोते हैं। तो मैंने कहा अरे हमारा तो हिंदुस्तान है, मैं हिंदुस्तानी कैरेक्टर प्ले कर रहा हूं मैं तो कुर्ता पहन कर ही करूंगा,तो मैं कुर्ता पहन कर ही सोया। असल में मुझे शर्म आ रही थी। मैं अपना जिस्म दिखाना नहीं चाह रहा था, इसलिए मैंने ये सब किया।’
इरफान ने एक इन्टरव्यू में अपने कैरियर के शुरूआती दौर के बारें में जिक्र करते हुए कहा था, कि उन्हे भी 'कास्टिंग काउच' के बेहूदगी भरे दिनों से गुजरना पड़ा था। बकौल इरफान - मुझे मेल और फीमेल दोनो की डायरेक्टर्स ने काम करने के लिए साथ सोने का आॅफर दिया था। ऐसा नहीं है, कि कास्टिंग काउच का सामना केवल ऐक्ट्रेस को ही करना पडे़। यहां नवयुवको के साथ भी ऐसा होता है। हालांकि इस परेशानी से लड़कियो को ज्यादा गुजरना पड़ता है। कास्टिंग काउच काफी फोर्सफुली किया जाता है और कभी-कभी इसकी पीड़ा असहनीय भी हो जाती है।
इरफान साफ़गोई भरी बातचीत में माहिर थे।
हालांकि ये बात और है कि, चरस, गाजां और अफीम की घुट्टी के साथ सुबह की शुरुआत करने वाले डायरेक्टर मंत्रियो को इरफ़ान का ये अदबी और जुनूं जैसा किरदार कम ही पसंद आया। इरफान के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। शुरुआती दौर में उनकी फिल्में आती और फ्लॉप होती रही। मगर एक्टर के रूप में इरफान की माँग बढ़ती रही। सबसे अहम बात थी, इरफान किसी मुगालते में नही रहे। उन्होंने धैर्य बनाएं रखा। बावजूद इसके इरफान की तारीफ होती रही। उनके काम में एक संजीदगी झलकती थी। रंगमंच में आने के बाद उनमें पारंपरिकता नही रही। दरअसल, वे शिक्षित होने के साथ-साथ प्रयोगधर्मी भी थे। वो अपने किरदार के सांचे बदलना जानते थे।

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में लकीर के फकीर बने निर्माता निर्देशक सफलता और तारीफ को दोहराना चाहते हैं जबकि इरफान इससे बचते हुए दिखाई देते हैं। इरफान ज्यादा फिल्मी नहीं करना चाहते थे उनका मानना है कि ज्यादा फिल्में करने से लोग ध्यान नहीं देंगे। और वैसे भी साधारण रोल के लिए उन्हें कुछ इंटरेस्ट नहीं था।

इरफ़ान ने अपनी ऐक्टिंग से दुनियादारी भले ही जीत ली, लेकिन बुज़दिल बॉलिवुड में इरफान अधिकतर उपेक्षा का शिकार होते रहे। वो कभी आॅस्कर नहीं जीत सके, इरफान को इसका मल़ाल रहा।

साल 2017 में एक मैगजीन से बातचीत के दौरान इरफान से ये सवाल पूछा गया था कि जब उन्हे आॅस्कर मिलेगा तो उनके अपने घर की कौन सी ऐसी जगह होगी जहां वो ये अवॉर्ड रखेंगे? इसका जवाब देते हुए इरफान ने कहा था कि- 'अगर मैं कभी ये अवॉर्ड जीतूंगा तो मुझे यकीन है कि ये अवॉर्ड घर में अपनी जगह कहीं ना कहीं बना ही लेगा। मगर बाथरूम में तो नहीं ही रखूंगा। इतना तो यकीन के साथ कह सकता हूं। इरफान की जवाबदेही से जाहिर है, कि वो जिसका इन्तज़ार हर एक एक्टर करता है। बावजूद इसके कि वो काबिलियत रखते हैं। वो सब उन्होंने अपनी एक्टिंग से कर दिखाया। वैसे इरफान के किरदार को सरकार ने तवज्जो दी, जिसकी वजह से उन्हे वर्ष 2011 में पद्मश्री मिला और अगले ही वर्ष 2012 में 'पान सिंह तोमर' में अपने बेजोड़ अभिनय के लिए उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार 'बेस्ट एक्टर अवार्ड' से भी नवाज़ा गया।
इरफान के जाने के बाद जब कुछ बुद्धिजीवियों के ज़हन में ऑस्कर का जिक्र आया तो हाल ही में ऑस्कर के 93वें समारोह का आयोजन किया गया तो उसमें इरफान को भी याद किया गया। मगर अब यह इरफान के लिए केवल सितम कश रह गया है। इसका सितम इरफान के फैन्स अपने दिल में सजोएं हुए हैं।
वैसे हमारे देश में खास परंपरा रही है, "आदमी मरने के बाद ही नजर आता है" गांधी विश्व शांति और अहिंसा के जीते-जागते प्रणेता होते हुए भी, मरने के बाद प्रासंगिक हुए। ये हमारी फजीहत ही कहलाएगी, कि हम मरे हुए व्यक्ति का मोल समझते हैं, चाहे जीवित रहते उसे उपेक्षाओं के भंवर से कयूं न गुजरना पड़े।

बहरहाल धर्म, जाति, संस्कृति आदि सभी से ऊपर उठकर इरफान हर किसी के साथ लज्ज़तबाय तरीके से पेश आते। इरफान का अभिनय उसकी उजूरी है। वैसा ही तरादार, वैसा ही तन्नाद, वैसा ही अनापरस्त।

श्रद्धांजलि !!

- प्रत्यक्ष मिश्रा (स्वतंत्र राइटर, पत्रकार)

prataykshmishra@gmail.com